भेजा है सफीना बहर को आज वो;
देखिये लौट के आए, न आए आज वो।
सुतून-ऐ-रौशनी से इशारे तो लगते हैं,
करीब जा के कहीं निकले न सराब वो।
यह आखरी गश्त है इस कोहना बदन का,
आज कहीं निकले न वक्त ख़राब वो
एक नाविक के पास बस और क्या भला?
कुछ याद साहिलों की और बस तुराब वो।
१३.७.9
भावार्थ: सफीना= किश्ती, बहर= समंदर, सुतून-ऐ-रौशनी = लाइट हाउस
सराब= मिरिचिका, कोहना बदन = बूढी किश्ती , साहिलों = समंदर के किनारे
तुराब = समंदर के किनारे की रेत /मिटटी

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