Wednesday, September 30, 2009

~ सफिने का सफर~

भेजा है सफीना बहर को आज वो;

देखिये लौट के आए, न आए आज वो।

सुतून-ऐ-रौशनी से इशारे तो लगते हैं,

करीब जा के कहीं निकले न सराब वो।

यह आखरी गश्त है इस कोहना बदन का,

आज कहीं निकले न वक्त ख़राब वो

एक नाविक के पास बस और क्या भला?

कुछ याद साहिलों की और बस तुराब वो।

१३.७.9

भावार्थ: सफीना= किश्ती, बहर= समंदर, सुतून-ऐ-रौशनी = लाइट हाउस

सराब= मिरिचिका, कोहना बदन = बूढी किश्ती , साहिलों = समंदर के किनारे

तुराब = समंदर के किनारे की रेत /मिटटी

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