मरती गयीं हर रोज़ मेरी रीश-ओ-फरहा,
अजब रहा तमाम उम्र ताकुब-ऐ-ताब-ऐ-सराह।
जिंदिगी रील के चक्के सी चली जाती है,
अहद-ओ-पेमान सब गुम हुए छलावे की तरहा।
एकदिन यूँही जिंदिगी की शाम ढल जायेगी,
अज़्म ही बस बाक़ी रहेगा नेक इरादे की तरहा।
२४.४.८
भावार्थ : रीश-ओ-फरहा = जड़ और टहनियां,
ताक्कुब =पीछा करना , ताब-ऐ-सराह = मिरिचिका,mirage chasing.
अहद-ओ-पेमान = वादे
अज़्म = इरादा .
Wednesday, September 30, 2009
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