वक्त की बदलती करवटों से मै ही अनजाना सा रहा
मैं आशना तो खूब रहा ; मगर बेगाना सा रहा!
खमीर मुझ से ही बने पुरकैफ शराबों के ,
मैं ख़ुद तो उन्हें पी न सका मगर मस्ताना सा रहा!
हर आशनाई का हासिल एक नई उदासी देता गया,
क्या दोस्तों के हिस्से में भी बस पछताना सा रहा?
जंगल सिर्फ़ एक था, मैं रहता तो तू न रहा होता;
सुकूत अपना, तेरी बका के लिए, गोया मर जाना सा रहा!
जिंदिगी और भी न जाने हमें क्या दिखलाएगी?
हयात-ऐ- हैदर* भी जैसे मसाइल का कारखाना सा रहा।
शब्दार्थ : आशना = jaana पहचाना , खमीर= ferment,
पुरकैफ= मस्त कर देने वाली , सुकूत=Silence, बका =preservation
Wednesday, September 30, 2009
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