Wednesday, September 30, 2009

~सलीब~

अच्छा हुआ जो रफीकों के जवाब नही आए,

सलीब पे लटकी हसरतों को ख्वाब नही आए।

जूनून-ऐ-जिंदिगी और उसके वोह सारे अज़ाब

क़दमों की आहट आती रही अहबाब नही आए।

तपते सेहरा और उनसे गुज़रती जिंदिगी,

धोके तो कई बार हुए; वो हुबाब नही आए ।

तेग्ज़नी अभी कुछ और बाक़ी रही हैदर* ;

खून-ऐ-वफ़ा सब तरफ़, रुबाब नही आए।

भावार्थ : रफीकों = दोस्तों के, सलीब= क्रॉस , ख्वाब= नींद/ ड्रीम

अहबाब= प्यारे दोस्त, हुबाब = बादल,

Teghzani = swordmanship, fencing.

Rubab= The ancient persian instrument of music containing numerous strings.

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