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Wednesday, September 30, 2009

~सलीब~

अच्छा हुआ जो रफीकों के जवाब नही आए,

सलीब पे लटकी हसरतों को ख्वाब नही आए।

जूनून-ऐ-जिंदिगी और उसके वोह सारे अज़ाब

क़दमों की आहट आती रही अहबाब नही आए।

तपते सेहरा और उनसे गुज़रती जिंदिगी,

धोके तो कई बार हुए; वो हुबाब नही आए ।

तेग्ज़नी अभी कुछ और बाक़ी रही हैदर* ;

खून-ऐ-वफ़ा सब तरफ़, रुबाब नही आए।

भावार्थ : रफीकों = दोस्तों के, सलीब= क्रॉस , ख्वाब= नींद/ ड्रीम

अहबाब= प्यारे दोस्त, हुबाब = बादल,

Teghzani = swordmanship, fencing.

Rubab= The ancient persian instrument of music containing numerous strings.

~बेगानगी ~

वक्त की बदलती करवटों से मै ही अनजाना सा रहा
मैं आशना तो खूब रहा ; मगर बेगाना सा रहा!
खमीर मुझ से ही बने पुरकैफ शराबों के ,
मैं ख़ुद तो उन्हें पी न सका मगर मस्ताना सा रहा!
हर आशनाई का हासिल एक नई उदासी देता गया,
क्या दोस्तों के हिस्से में भी बस पछताना सा रहा?
जंगल सिर्फ़ एक था, मैं रहता तो तू न रहा होता;
सुकूत अपना, तेरी बका के लिए, गोया मर जाना सा रहा!
जिंदिगी और भी न जाने हमें क्या दिखलाएगी?
हयात-ऐ- हैदर* भी जैसे मसाइल का कारखाना सा रहा।

शब्दार्थ : आशना = jaana पहचाना , खमीर= ferment,
पुरकैफ= मस्त कर देने वाली , सुकूत=Silence, बका =preservation